फिर कोई ख्वाब अधूरा रह गया!


फिर कोई ख्वाब अधूरा रह गया!
कोई गुलाब अधखिला रह गया........!!
तनहईयों कि चादर कुछ इस तरह ओढ़ कर बैठे रहे....
कि अँधेरेमैं डूबे रौशनी को खोजते रहे!!
मावस से पूनम, पूनम से मावस "रात का राजा " भी अपनी कलाएं बदलता रहा ....
और हम " कलाराहित",पल-पल "जीवन कि रात" को जीते रहे....
कहा करते हैं,समय का पहिया कभी थमता नहीं!
पर हम तो अपने समय के साथ,थामे से खडे रहे......
ख्वाब का दिया जलाये बैठे थे....
दो हाथों का सहारा, तन्हाई कि चादर हटाएगा...
रौशनी कि चाह मैं पलकें भिगाये बैठे थे.......
हर आहट पर लौ डगमगा जाती...
कि किरणों से "आलिंगन कि चाह" उसे सताती....
तन से मन तक केवल भूख ही थी हमारी....
"इंसानों के जहाँ" मैं जी रहे हैं,आज उत्तर गयी ये भी खुमारी.....
पहली बार कोई अपने पन से हम तक आया....
ड़बड्बायी आंखों से ताका,तो उसे "काल का साया" पाया ......
बहुत देर कि अपनाने मैं........
जल्दी कि होती "परमात्मा " से मिलवाने मैं....
अंगों से लाचार, इस जहाँ मैं भेज दिया....
गुनाह थे मेरे , ऐसा कर तुमने गुनाह किया......
आत्मा को तो तुमने साथ ले लिया....
पर ये बदनसीब, तिरस्कृत रह गया....
हाय! फिर कोई ख्वाब अधूरा रह गया....
फिर कोई गुलाब अध खिला रह गया...!


..........एहसास!

1 टिप्पणी:

Mukesh Kumar Sinha ने कहा…

मेरा ख्वाब है की तुम्हारे हर ख्वाब पूरे हों ...
शानदार !!

mukesh

धन्यवाद !

एहसासों के सागर मैं कुछ पल साथ रहने के लिए.....!!धन्यवाद!!
पुनः आपके आगमन की प्रतीक्षा मैं .......आपका एहसास!

विशेष : यहाँ प्रकाशित कवितायेँ व टिप्पणिया बिना लेखक की पूर्व अनुमति के कहीं भी व किसी भी प्रकार से प्रकाशित करना या पुनः संपादित कर / काट छाँट कर प्रकाशित करना पूर्णतया वर्जित है!
(c) सर्वाधिकार सुरक्षित 2008