Monday 5 September 2011

निज में लौटा हूँ !

भोर की लाली क छल जेसा !
जीवन ताप तप्त झुलसाए!
अपने निज को खोजता, निज में लौटा हूँ!
एक शाम फिर उसी आशियाने लौटा हूँ !!

दरों - दीवारों से रंग खोया !
हर सपना आँखों में जा सोया !
खंडहर तन में मन - अक्षय ......
एहसास की लौ से रोशन करने लौटा हूँ!
एक शाम फिर उसी आशियाने लौटा हूँ !!

 अब भी शब्दों की सुगंध तजा हे !
 एकाकी कलरव हे, मन रजा हे!
जो बिछुड़ गए थे मोड़ कहीं .......
उन् शब्द सखाओं को शब्दों से जोड़ने लौटा हूँ !
एक शाम फिर उसी आशियाने लौटा हूँ !!

गम कितने हैं, कौन ये जाने !
 रहे दिन कितने कौन ये जाने !
 मुस्काने के, मिल जाने के........
 जी जाने क लम्हों को फिर से सजाने लौटा हूँ !
एक शाम फिर उसी आशियाने लौटा हूँ !!

एक शाम फिर उसी आशियाने लौटा हूँ !!

एहसास .........

Followers