भूल गया !

कहना चाह कर भी .....
कहना भूल गया!
शोर सुना इतना की ...
सुनना भूल गया!
चुप रहना सिख कर ......
चुप रहना भूल गया!
इंसानों की बस्ती में़़़़
इंसान चुनना भूल गया!!

दौड़ने की चाह थी़़़़
चलना भूल गया!
भावों की कदम ताल मैं .....
चाल अपनी भूल गया।
राह के राही देखे ़़़़़
रास्तों को भूल गया।
इनसानों की बस्ती में़़़़
इनसान चुनना भूल गया।।

अपना अपना करते करते ़़़
अपने को ही भूल गया।
अपने पन की भाषा सुऩ़़
हर परिभाषा भूल गया।
मिलते थे, मिलते हैं ़़़
दिल मेरा मिलना भूल गया।
इनसानों की बस्ती में़़़़
इनसान चुनना भूल गया।।

सपनों में प्रीत बसा के ़़़
जीवन के रीत भूल गया।
समझदारों कि दुनिया में ़़़
मन के मीत भूल गया।
बहरूपियों के मेले मे़़
खुद अपना रूप ही भूल गया।
इनसानों की बस्ती में ़़़
इनसान चुनना भूल गया।।
इनसान चुनना भूल गया।।


एहसास ़़़़।।

13 टिप्‍पणियां:

sushma 'आहुति' ने कहा…

बेहतरीन अभिवयक्ति.....

देवदत्त प्रसून ने कहा…

बहुत सुन्दर !

एहसास ने कहा…

dhanywaad sushma ji and prasoon ji

Dilbag Virk ने कहा…

आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 19-02-2015 को चर्चा मंच पर चर्चा - 1894 पर दिया जाएगा
धन्यवाद

Pratibha Verma ने कहा…

बहुत सुन्दर...

Malhotra Vimmi ने कहा…

सुंदर एहसास

KAHKASHAN KHAN ने कहा…

बहुत ही अच्‍छी और दिल को छू लेने वाली कविता।

एहसास ने कहा…

प्रतिभा जी धन्यवाद।

एहसास ने कहा…

विम्मी जो धन्यवाद ।

एहसास ने कहा…

कहकशां जी इस प्रशंशा के लिए धन्यवाद।

संजय भास्‍कर ने कहा…

दिल को छू लेने वाली कविता।

GathaEditor Onlinegatha ने कहा…

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Digvijay Agrawal ने कहा…

आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" बुधवार 03 फरवरी 2016 को लिंक की जाएगी............... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

धन्यवाद !

एहसासों के सागर मैं कुछ पल साथ रहने के लिए.....!!धन्यवाद!!
पुनः आपके आगमन की प्रतीक्षा मैं .......आपका एहसास!

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