मैं!


मैं!
साहित्य के नाम पर सजी पर,
कभी न पढी गयी!
किताब का एक प्रष्ठ मात्र हूँ!
मैं!
रचा तो गया पर,
कभी मंचित न हुआ!
उस नाटक का पात्र हूँ!!
मैं!
खोजो तो अथाह गहराई लिए,
शांत - प्रशांत हूँ!
मैं!
गर महसूस करो तो ,
एहसासों से बनी!
ओस की एक बूँद मात्र हूँ!!
मैं!
गर दो पल दुःख को बाटने ,
साथ बैठो तो....
हर नयन से फ़ुट पड़े वो नयन प्रपात हूँ!
मैं!
गर खुशी मैं पास बुलाओ तो.....
चक्षुओं की चमक, अधरों की खुशी,
और ह्रदय स्पंदन के मधुर धुन से सजा गान हूँ!
मैं!
स्वयं दिवा का दिवाकर हूँ!
मैं ही रश्मि का शशि!
मैं!
हर दिल मैं एहसास बन रहता हूँ,
फ़िर भी ख़ुद गुमनाम हूँ!
मैं!
शान्त- सौम्या "मुकुल "
झूम उठूं तो " मयुरा "
थोड़ा सा सीधा, थोड़ा सा शैतान हूँ!
मैं !
अपने ही अंतर्मन्न मैं खोया,
जो शब्दों मैं सिमटा तो.....
एहसास हूँ!!
मैं स्वयं सवाल का जवाब हूँ!
मैं कौन हूँ?
मैं क्या हूँ?

........एहसास!

4 टिप्‍पणियां:

अमिताभ फौजदार ने कहा…

behad sundar likha hai !!

vandana ने कहा…

achcha likha hai mukul !!!

रश्मि प्रभा ने कहा…

तुम अपने एहसासों को इतने सुन्दर रूप में ढालते हो,
कि,मन सोचने लगता है कि प्रशंसा का सूत्र कहाँ से उठाऊं,
बहुत बढिया.........

Mukesh Kumar Sinha ने कहा…

tumhari ab tak ki kavita main sabse sundar, aur sabse smriddh, har shabd ka sundar upyog kiya hai tumne.............mujhe viswas hai ...........tum bahut aage jaoge...........

ek ajuba........

software engg....kavi...:P

mukesh bhaiya

धन्यवाद !

एहसासों के सागर मैं कुछ पल साथ रहने के लिए.....!!धन्यवाद!!
पुनः आपके आगमन की प्रतीक्षा मैं .......आपका एहसास!

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