
बंद पलक संग संग मुस्काया
खुली पलक फ़िर रुला गया!
मैं साथी तेरे, एक साथ को तेरे,
मंजिल की डगर को भुला गया!!
कभी लडे कभी संग हंसा किए!
अनजाने भाव गीत जिया किए!
तू लूट के वो लम्हों को मेरे,
मुझे विरह की अभिव्यक्ति बना गया!!
बंद पलक संग संग ...............
कभी खुशियों से था आबाद जहाँ मेरा!
अब दुःख की घटाएं घिर आयीं!!
कभी मल्हारें आंखों ने गाईं,
अब दर्द भरी कलम थमा गया!!
बंद पलक संग संग.......
जब तुम थे और था साथ तुम्हारा,
तब ये ही था संसार मेरा!!
अब अश्रु - कलम संग संसार खड़ा,
पर अपना होकर भी तू पराया बना गया!!
बंद पलक संग संग ............
आंखों मैं नीर, शब्दों मैं पीर!
चित शांत लिए पर,
भावों मैं अधीर!!
तू मन मीत को,
दर्द गीत बना गया!!
बंद पलक संग संग मुस्काया!
खुली पलक फ़िर रुला गया!!
..........एहसास!